Thursday, October 4, 2007

धान के देश में - 26

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 26 -

इतवारी में हनुमान जी के मन्दिर में जिस युवती को देख कर सदाराम विस्मित हो गया था उसके गोल चेहरे से सुन्दरता झाँक रही थी। कपड़े उसके किसी ईसाई स्त्री के कपड़ों के समान साफ थे और वैसे ही पहने भी गये थे। पर वह लड़की हिन्दू ही थी। यदि ऐसा न होता तो वह हनुमान जी के दर्शन करने क्यों आती। जिस समय वह युवती और सदाराम मन्दिर में थे उसी समय वहाँ अधारी भी आ गया। तभी वह लड़की चली गई। सदाराम ने कौतूहलवश उस लड़की के बारे में पूछा तो अधारी ने बताया कि उसका नाम जानकी है और उसके पिता का नाम रतीराम। ये लोग कल ही यहाँ आये हैं। बाप-बेटी के सिवाय और कोई इनके परिवार में नहीं हैं। खैरागढ़ इलाके के एक गाँव से अपनी पत्नी के मर जाने के बाद अपनी पुत्री जानकी को लेकर कमाने-खाने के लिये रतीराम आसाम चला गया था। वहाँ चाय बागान में नौकरी करता था। एक अंग्रेज परिवार से भी उसकी अच्छी जान पहचान हो गई थी। जानकी का अधिक से अधिक समय तब तक वहीं बीता जब तक वह ब्याह के योग्य नहीं हो गई। आसाम छोड़कर अब ये लोग नागपुर आ गये हैं।
अधारी सदाराम को रतीराम के घर उससे मिलाने ले गया। जानकी ने बड़े ही अच्छे ढंग से उसका स्वागत किया। बातचीत के सिलसिले में जानकी को मालूम हो गया कि सदाराम और उसके मित्र महेन्द्र ने ही उस बस्ती में सुधार के काम किये हैं। तब वह भी उस काम में हाथ बँटाने के लिये तैयार हो गई। एक दिन जब महेन्द्र, सदाराम, अधारी, रतीराम ०र जानकी बैठे थे तब जानकी बोली, "आप लोगों ने बहुत कुछ किया है पर मेरे ख्याल से एक काम छूट गया है जो आवश्यक है।"
"कौन सा काम?" सदाराम ने पूछा।
लड़की-लड़कों को पढ़ाने की व्यवस्था। हमको एक छोटी सी पाठशाला भी खोलनी चाहिये जहाँ बच्चे पढ़ सकें।" जानकी बोली।
"यह तो ठीक है पर उसे नियमित रूप से चलाना भी तो चाहिये। यहाँ तो हम लोग ही पढ़ने आये हैं और परीक्षा के बाद वापस चले जायेंगे। यदि स्कूल भी खोल दें तो आगे क्या होगा?" महेन्द्र के शब्द थे।
"होगा क्या। स्कूल बराबर चलता ही रहेगा। मैं जी तोड़ परिश्रम कर उसे बन्द न होने दूँगी। मैंने आसाम में चौथी अंग्रेजी तक शिक्षा पाई है और एक अंग्रेज परिवार के साथ रह कर बहुत कुछ सीखा है।"
जानकी के स्वर में गम्भीरता और चेहरे पर प्रसन्नता थी।
"तो यह काम भी होगा।" महेन्द्र बोला।
किन्तु मजदूरों ने जानकी के इस प्रस्ताव का विरोध किया। उनकी मुख्य शिकायत थी कि पढ़-लिख कर उनके बच्चे मेहनत-मजदूरी से नफरत करने लगेंगे। पर जानकी के समझाने पर सब राजी हो गये और पाठशाला भी चलने लगी।
महेन्द्र कुछ दिनों से सदाराम में एक परिवर्तन देख रहा था। जब उसने उसका उचटा हुआ मन, बढ़ती हुई गम्भीरता, उदासी और दीर्घ निःश्वास की अधिकता देखी तो एक दिन कहा, "सदाराम, मालूम होता है आजकल तुम जानकी के बारे में बहुत सोचा करते हो। अगर तुम्हें उससे प्रेम हो गया है तो मैं खुद राजो से कह कर जानकी के साथ तुम्हारा ब्याह करा दूँगा। पर तुम जानते हो कि हमारी पढ़ाई का यह 'फाइनल इयर' है, इसलिये अभी तो जानकी को 'आँख की किरकिरी' मत बनाओ।"
सदाराम सीधे स्वभाव का था। जब महेन्द्र ने उसकी नाड़ी की गति बिलकुल ठीक पहचान ली तब वह सिटपिटा गया और तुरन्त स्वीकार करते हुये बोला, "महेन्द्र, मैं क्या करूँ। जबसे मैंने जानकी को देखा है, न जाने मुझे क्या हो गया है। रात-दिन उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने रहता है।"
"लेकिन परीक्षा की तैयारी तो तुम्हें करनी ही होगी। बाद में सब ठीक हो जायेगा। तुम दोनों के ब्याह में कोई विशेष बाधा तो होगी नहीं।" महेन्द्र ने कहा। सदाराम बड़ा ही भावुक था। वह नहीं चाहता था कि प्रेम एकांगी हो। श्यामवती के ब्याह और उसके दुष्परिणाम ने उसके हृदय को गहरी ठेस पहुँचाई थी। इसीलिये उसने महेन्द्र से पूछा, "सब कुछ ठीक हो जावेगा पर क्या जानकी मेरे साथ ब्याह करने के लिये राजी होगी?"
सदाराम की बात सुनकर महेन्द्र बड़े जोर से हँसा और बोला, वाह रे बुद्धू, वह राजी क्यों नहीं होगी। उसके लिये तेरे समान बी।एजी. होने वाला दूसरा कौन बैठा है। मैं तो समझता हूँ कि वह भी तरे लिये तड़पती होगी।"

"अगर ऐसा नहीं हुआ और जानकी अपनी इच्छा के विरुद्ध मुझे ब्याह दी गई तो.......? यही देखो न, अपनी श्यामवती को। उसके साथ ऐसा ही तो हुआ है।" सदाराम ने डाँवाडोल होते हुये मन से कहा।
श्यामवती का नाम सुनते ही महेन्द्र को ऐसा लगा मानो किसी ने पके हुये फोड़े पर जोरों पर आघात कर दिया हो। उसकी विनोद-प्रियता कपूर की तरह उड़ गई। वह एकदम गम्भीर होकर बोला, "अच्छा यह सब रहने दो अब। बाद में देखा जायेगा। अभी तो मन लगाकर पढ़ना और पास होना ही हमारा एकमात्र कर्तव्य है, नहीं तो दादा की इच्छा पर पानी फिर जायेगा।" महेन्द्र की बात का सदाराम पर गहरा प्रभाव पड़ा और सब ओर से मन हटाकर वह तुरन्त ही पढ़ने में लग गया। महेन्द्र ने भी पुस्तक पर आँखें गड़ाईं पर उसका मन उद्विग्न हो गया था। उसे अक्षर धुँधले और पुते हुये दिखाई देने लगे। बड़ी देर तक वह श्यामवती के बारे में सोचता हुये टहलता रहा। न जाने श्यामा पर क्या बीतती होगी। सदाराम थोड़ी देर बाद सो गया और वह भी लेट गया पर बड़ी देर तक उसे नींद नहीं आई। उसकी पलकें गीली थीं और विचारों के उहापोह में न जाने कब वह सपनों में खो गया।
(क्रमशः)

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