Tuesday, October 16, 2007

हाल्ट! हुकम सदर

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कहानी)

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यह सोचना सच नहीं होगा कि कठोर कर्तव्य वाली नौकरी में रात-दिन उलझे रहने के कारण पुलिस वालों में कोमल भावनायें नहीं होतीं। उनके पास भी हृदय होता है और हृदय में कम से कम अपनों के लिये तो दया, क्षमा, सहानुभूति, ममता और स्नेह की कोमल भावनायें रहती ही हैं। पुलिस वालों के भी कुटुम्ब होते हैं जिनमें पत्नी, पुत्र-पुत्री, माता-पिता, भाई-बहन रहते हैं जिनके प्रति वे कठोर कैसे हो सकते हैं। पुलिस विभाग में काम करने वाले हवलदार सुजान सिंह के मस्तिष्क में भी कर्तव्य की निर्मम कठोरता और हृदय में अपनी पुत्री प्रेमा के लिय अगाध प्रेम था। कुटुम्ब के नाम से वे, उनकी विधवा बहन राधा और जवान लड़की प्रेमा के सिवाय और कोई नहीं था। राधा गाँव में रह कर थोड़ी से खेती-बाड़ी की देखभाल किया करती थी। प्रेमा की माँ उसके बचपन में ही चल बसी थी। उसे राधा ने ही प्यार से पाला था और पिता के स्नेह ने किसी दुःख का अनुभव होने नहीं दिया था। सुजान सिंह प्रेमा के ब्याह की चिन्ता में डूबे रहते थे।

प्रेमा के कदम यौवन में पड़ चुके थे। उसका रूप-लावण्य निखर आया था। यौवन के साथ आकर्षण स्वाभाविक ही होता है पर प्रेमा अपने रूप को बनाव-श्रृंगार का सहारा देकर अधिक खींच लेने वाला बनाती थी। शिक्षा के नाम से वह कुल प्रायमरी ही पास थी। एक तो सुजान सिंह की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह उसे आगे पढ़ा पाता। दूसरे वह इस पक्ष में भी नहीं था कि लड़कियों को आधुनिक शिक्षा दी जावे। उसकी दृष्टि से इतनी ही शिक्षा काफी थी कि लड़की रामायण पढ़ ले और चिट्ठी-पत्री लिख-बाँच सके।

सुजान सिंह घर की ओर से चिन्ता मुक्त थे। प्रेमा घर के सब काम-काज करती और अवकाश का समय पड़ोस की सहेलियों के साथ बिता लेती थी। उसके जीवन में कोई विशेष आकांक्षा थी ही नहीं। प्रकृति से तो हर आदमी लाचार रहता है - फिर प्रेमा भी इसका अपवाद कैसे हो सकती थी।। यदि उसके मन में कोई इच्छा आती भी तो बस इतनी ही कि अब उसका ब्याह हो जाना चाहिये। सहेलियों के बीच भी लगभग इसी विषय पर बातें होती थीं या फिर युग के प्रभाव के अनुसार सिनेमा की चर्चा होती। पढ़ने की दिशा में वे लड़किया रामायण या दूसरे सद्ग्रंथ तो कम पर सस्ती पत्रिकायें, रोमांस से भरे हुये उपन्यास और कहानियाँ ही अधिक पढ़ लेती थीं। उन्हें क्या पता कि उनके मन में सोई हुई वासना इन सब बातों से किस प्रका धीरे धीरे जाग कर उमड़ जावेगी।

घर में बढ़ी हुई लड़की हो तो उसके ब्याह की चिन्ता माता-पिता को व्याकुल किये रहती है। सुजान सिंह प्रेमा के लिये वर ढूँढने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे। उन्होंने कई जगह बात चलाई पर कहीं मन पसन्द लड़का नहीं मिलता था तो कहीं भारी रकम माँगी जाती थी। समाज तो यह नहीं देखता कि कौन कितनी जीविका अर्जित करता है और किसकी कितनी आर्थिक स्थिति है पर लड़की के ब्याह के लिये उसके पिता की हैसियत से कई गुनी अधिक रकम हर जगह माँगी जाती है। किसी को यह चिन्ता तक नहीं कि इस राक्षसी प्रथा से कितनी ही लड़कियाँ कुँवारी बैठी रह जाती हैं और उनका जीवन घुन लगी हुई लकड़ी की तरह हो जाता है। सुजान सिंह अपने कर्तव्य में ईमानदार थे। इसी लिये वे घूसखोरी या और किसी प्रकार के भ्रष्टाचार से इतनी अधिक रकम नहीं कमा सके थे जिससे प्रेमा का ब्याह अच्छी खासी दहेज देकर कर सकते।

सुजान सिंह इस बात का बराबर ध्यान रखते थे कि प्रेमा अपने जीवन से ऊब न जाये। इसीलिये वे उसे कभी-कभी अपनी बहन राधा के पास कुछ दिनों के लिये गाँव भेज देते जिससे वातावरण बदलने के साथ-साथ उसका मन बहलता रहे।

उस दिन राधा गाँव से आई। उसने प्रेमा को पैनी नजर से देखा - वह उसके मनोभावों का मानो अध्ययन करना चाहती हो। उसने देखा सुजान सिंह तो अधिकतर ड्यूटी पर ही रहते हैं। और फिर वह पुलिस की ड्यूटी ठहरी। चौबीस घण्टे में कहीं भी किसी भी समय जाना पड़ जाता है। प्रेमा को अपनी मनचली सहेलियों के साथ रहने का ही अवसर अधिक मिलता है। राधा ने भाँप लिया कि यद्यपि प्रेमा युवती हो गई है तो भी उसके मुख की सुन्दर प्रसन्नता पर चिन्ता का हल्का सा बादल छाया रहता है। राधा ने भी इससे चिन्ता और दुःख का अनुभव किया और एक दिन सुजान सिंह से पूछ कर कुछ दिनों के लिये प्रेमा को अपने साथ गाँव ले गई।

प्रेमा के गाँव चले जाने के बाद सुजान सिंह का जीवन और भी अस्त-व्यस्त और स्वच्छन्द हो गया। कभी-कभी वे ड्यूटी के बाद भी घर नहीं आते थे। किसी बासे में खा लेते और थाने में ही सो रहते थे। वे प्रेमा की ओर से भी कुछ निश्चिंत-से हो गये थे पर उनके मन में उसके ब्याह की चिन्ता प्रति क्षण लगी ही रहती थी।

और एक दिन गाँव से राधा ने अचानक सूचना भेजी कि वे तुरन्त ही आकर अपने प्रेमा की देखभाल स्वयं ही करें। इससे सुजान सिंह के मन की उद्विग्नता में उफान सा आ गया। ऐसी कौन सी बात हो गई जो उसे प्रेमा की देखभाल लकरनी पड़ेगी। कहीं प्रेमा बीमार तो......। उनका हृदय इस विचार से ही धक् से होकर काँप उठा। इस कल्पना से ही उनकी आँखों के सामने चित्र-सा खिंच गया कि प्रेमा खाट पर पड़ी है - शरीर क्षीण हो लगया है, आँखें धँस गई हैं। किन्तु सुजान सिंह ने धीरज का सहारा लिया और उसके मन में इसके विपरीत भाव लहराये कि ऐसा नहीं होगा। शायद कुछ और दूसरी ही बात हो।
सुजान सिंह किसी तरह से भी दो दिन की छुट्टी लेकर गाँव चले गये।

(तीन किश्तों में से प्रथम किश्त)

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